Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
स एव चैकोऽनेकश्च सर्वसत्त्वात्मवेदनात् ।
स एवेदं जगद्धत्ते जगत्कोशस्तथैव हि ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा एक होते हुए भी अनेक संख्यावाले किसके अन्दर लाखों ब्रह्माण्ड लीन होते हैं,
इस अभिप्राय से तुम्हारा वह प्रश्न है, ऐसा कहते हैं।
वही एक है और सम्पूर्ण सत्त्वों में आत्मप्रतीति होने से अनेक भी है । किस समदृष्टि के
अन्दर यह जगत् सदा स्थित है, इस प्रश्न का उत्तर यह है । वही इस सम्पूर्ण जगत् को धारण
करता है। कौन जगद्रूपी रत्नों का कोष है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। और वही जगत् का कोष
भी है