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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

चिन्मात्राणुः स एवेह सर्वं किंचिन्मनःस्थितम् । न किंचिदिन्द्रियातीत रूपत्वादमलः स्थितः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

कौन सब है और कुछ भी नहीं है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। चिन्मात्र वही अणु सब है । जो अपरिच्छिन्न है, वह परिच्छिन्न सर्वस्वरूप कैसे होगा ? मन ओर इन्द्रियो की वृत्तियों से नानाप्रत्यय होने से मन से परिच्छिन्नरूप से ही वह सर्वात्मक है और इन्द्रियातीत होने के कारण निर्मल वही चिदणु “न किंचित्‌" (कुछ भी नहीं) इस रूप में स्थित है