Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
कयाचिदपि युक्त्येह सतोऽसत्त्वं न युज्यते ।
सर्वात्मा स्वात्मगुप्तेन अपूरेणेव दृश्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्पदार्थ का असत् से विरोध है, इससे भी उसे असत् कहना युक्त नहीं है, ऐसा कहते हैं।
किसी भी युक्ति से सत् वस्तु की असत्ता सिद्ध नही की जा सकती ।
शंका : यदि वह है, तो उसका दर्शन क्यो नहीं होता 2
समाधान : यद्यपि पृथक् रूप से उसका दर्शन नहीं होता, फिर भी सबमें अनुगत सद्रूप से,
जो कि आवरण से गुप्त है, सर्वात्मा वह दिखलाई पड़ता है, जैसे कपूर अपनी सुगन्धि से
प्रतीत होता है, वैसे ही सबमें व्याप्त वह प्रत्यक्रूप से प्रतीत होता है