Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
सर्वात्मकत्वान्नैवासौ शून्यो भवति कर्हिचित् ।
यदस्ति न तदस्तीति वक्ता मन्ता इति स्मृतः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
“कौन अणु है और नहीं भी है“ इस प्रश्न मे उक्त नहीं है" अंश बाधित ही है, यों उक्त
अंश को दूषित करते हैं ।
जो सर्वात्मक है, वह शून्य कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि वह है नहीं, ऐसा कहनेवाला
और मनन करनेवाला आत्मा ही तो है यानी उक्त आत्मा ही वक्ता ओर मन्ता के रूप में प्रसिद्ध
है। अपने आत्मा का अपलाप न हो सकने के कारण उसकी नास्तिता नहीं कही जा सकती है,
यह भाव है