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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

गच्छन्न गच्छत्येषोऽणुर्योजनौघगतोऽपि सन् । संवित्त्या योजनौघत्वं तस्याणोरन्तरे स्थितम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

चलता हुआ भी कौन नहीं चलता है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं । अणु होता हुआ भी आकाश की नाई हजारों योजनो में व्याप्त वह चलता हुआ भी नहीं चलता है, स्वप्न के समान कल्पना से हजारों योजन उस अणु के अन्दर स्थित हैं