Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
निमेषप्रतिभासो हि निमेष इति कथ्यते ।
कल्पेति प्रतिभासो हि कल्पशब्देन कथ्यते ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कि अणु है, इस अंश के तात्पर्य को स्फुट करते हैं।
जो यह जगत् भासित होता है, वह चेतन का स्फुरणमात्र ही है, इसलिए पर्वत आदि सत्य
नहीं है, अतः अणु में ही मेरूता प्रतीत होती है ॥३ ७॥
निमेष होता हुआ भी कौन कल्प है, इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं।
वही अणु निमेष की तरह भासित होता है, अतः निमेष कहा जाता है, वही कल्प के समान
प्रतीत होता है, अत: उसमें कल्पशब्दका व्यवहार होता है