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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

निमेषकल्पशैलादिपूरयोजनकोटयः । यत्राऽणावेव विद्यन्ते तत्र द्वैतैक्यते कुतः ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस अत्यन्त सूक्ष्म अणुमें ही निमेष, कल्प, पर्वतसमूह और अनेक करोड़ योजन विद्यमान हैं, यानी अपने मिथ्यात्व का अवलम्बन कर प्रविष्ट होते हैं उसमें द्वैत और एेक्य कहाँ ? यानी द्वैत और एकता का भी मिथ्यात्व से ही उसमें समावेश है