Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verses 54–55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verses 54–55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 54,55

संस्कृत श्लोक

माययांशुकणाङ्के खे यथा कचति काञ्चनम् । तथा जगदिदं भाति चिच्चेत्यकलने कुतः ॥ ५४ ॥ स्वप्नगन्धर्वसंकल्पनगरे कुड्यवेदनम् । न सन्नासद्यथा तद्वद्विद्धि दीर्घभ्रमं जगत् ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

माया से जैसे सूर्य-किरणों के लेश से युक्त आकाश में स्वर्णं स्फुरित होता हे, वैसे ही यह जगत्‌ भी स्फुरित हुआ है, इसमें चित्कल्पना या चैत्यकल्पना कैसे हो सकती है, जैसे स्वप्ननगर में, गन्धर्वनगर में या संकल्प से कल्पित नगर में दीवार का ज्ञान न सत्‌ है ओर न असत्‌ है, वैसे ही दीर्घ भ्रमरूप इस जगत्‌ को जानो