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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 59

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 59

संस्कृत श्लोक

पृथक्तामतिभासस्य स्वचमत्कारयोगतः । सर्वात्मिका हि प्रतिभा परा वृक्षात्मबीजवत् ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार युक्तिपूर्वक प्रसंगप्राप्त (कि चेतनमचेतनम्‌” इस प्रश्न का उत्तर देकर शेष प्रश्नों का उत्तर देनेका भार राजा पर छोड़ते हुए मन्त्री मन्त्री को शायद्‌ इन प्रश्नों का उत्तर ज्ञात ही न हो, इस शंका की निवृत्ति के लिए उनमें से दो एक का उत्तर कहने की इच्छा से द्वैतमिथ्यात्व के उपवर्णन द्वारा द्वैतमप्यपृथक्‌कस्मात्‌” इत्यादि प्रश्नका उत्तर देते हैं। द्वैतवासना से वासित बुद्धिवृत्ति के अन्तर्गत आत्मप्रकाशका जो भेदप्रकटन शक्तिरूप स्वचमत्कार है, उसके सम्बन्ध से प्रतीत हुआ भी द्वैत अपृथक्‌ ही है, क्योकि वृक्ष के आत्मा बीज की नाई वह परम आत्मप्रकाश सर्वात्मक हे