Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 80, Verse 62
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 80, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
शान्तं समस्तमजमेकमनादिमध्यं नेहास्ति काचन कलाकलना कथंचित् ।
निर्द्वन्द्वशान्तमतिरेकमनेकमच्छमाभासरूपमजमेकविकासमास्ते ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीसे सव प्रश्नों का उत्तर प्रायः हो गया, ऐसा सूचित करते हुए सव प्रश्नों की
परमतात्पर्या-विषयभरूत अद्वितीयचिन्मात्र-परमा्थस्थिति का प्रदर्शन करते हुए
उपसंहार करते है ।
शान्त, सर्वात्मक जन्मरहित, अद्वितीय, आदि ओर मध्य से शून्य, शान्तबुद्धि पुरुषों से
ही माया ओर माया के कार्यरूप मल का परिहार करने से परिशोधित होनेवाला एकत्व गुण
से रहित जो चारों ओर बृहत् होने के कारण निरंकुशरूप से विकसित होता है, ऐसा निर्मल
ब्रह्म ही है, उसमें किसी प्रकार की कल्पना का किसी प्रकार भी सम्भव नहीं हे