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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 106

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 106 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 106

संस्कृत श्लोक

एकेन तेन महता परमाणुना च व्याप्तं ततं विरचितं जनितं कृतं च । दृश्यं प्रपञ्चरचितं नभसेव विश्वं शून्यत्वमच्छमभितः परिलब्धमेव ॥ १०६ ॥

हिन्दी अर्थ

यह त्रिजगत्‌ किसके द्वारा निर्मित है ? इस प्रश्न का उत्तरदेतेहै। जैसे आकाश द्वारा गन्धर्वं नगर आदि दृश्य नाना विचित्र प्रपंचरूप से बनाया गया भी चारों ओर निर्मल शून्यता को यानी आकाशस्वरूपता को प्राप्त ही है, वैसे ही उस एक महान्‌ ओर परमाणु से विश्व अपंचीकृत पंचभूतों के रूप से विस्तारित हे, पंचीकरण द्वारा ब्रह्माण्ड ओर भुवनरूप से बनाया गया है, उन ब्रह्माण्ड ओर भुवनो में देव, मनुष्य, असुर, तिर्यक्‌ भेद से उत्पन्न किया गया है ओर उनके भोग के लिए तत्‌-तत्‌ विषयों के भेद से रचा गया है