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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 107

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 107 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 107

संस्कृत श्लोक

द्वैतेन सुन्दरतरं स्वमनुज्झितेन रूपं सुषुप्तसदृशेन यथावबोधात् । ऐक्यं गतं स्थितिगमागममुक्तमेवमित्थं स्थितं तनु जगत्परमार्थपिण्डः ॥ १०७ ॥

हिन्दी अर्थ

“किसके दर्शन से निर्मलद्ठष्टि होकर तुम उससे अन्य नहीं होते अथवा सदा ही तद्रूप होते हो“ इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। चित्संमिश्रिति जड़ अविद्यामात्ररूप होने के कारण सुषुप्ति के सदृश, स्वकाल में भी यानी दवितावस्था में भी सत्ता और स्फूर्ति के व्यवहार की सिद्धि के लिए सच्चिदानन्दैकरस होने से अत्यन्त सुन्दर अपने स्वरूप अर्थात्‌ अधिष्ठान आत्मतत्व का त्याग न किये हुए द्वैत ने जब यथास्थित आत्मतत्त्व के ज्ञान से स्थिति, गमन और आगमन से मुक्त एेक्य को प्राप्त किया तब क्षुद्र जगत्‌ परमार्थ पिण्डरूप ही रह जाता है इस प्रकार वह ब्रह्मीकस्वभावता से स्थित हे । इसलिए मैं संसाररूप नहीं हूँ, किन्तु सदा अद्वितीय ब्रह्मरूप ही हूँ, यह भाव है