Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 1–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 82, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति राजमुखाच्छुत्वा कर्कटी वनमर्कटी ।
अवबुद्धपदान्तं स्वं जहौ मत्सरचापलम् ॥ १ ॥
अन्तःशीतलतामेत्य विश्रान्तिमपतापताम् ।
प्राप्ता प्रावृण्मयूरीव सज्योत्स्नेव कुमुद्वती ॥ २ ॥
तथा राजगिरा तस्या आनन्द उदभूद्भृशम् ।
गर्भेऽन्तः खे बलाकाया रवेणेव पयोमुचः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार राजा के मुख से सुनकर उस वन की
बन्दरीरूपी कर्कटी राक्षसी ने अपनी राक्षस जाति के योग्य मात्सर्यप्रयुक्त चपलताका, जिसका
कि ज्ञात ब्रह्मपद ही मूलोच्छेदपूर्वक नाश है, त्याग कर दिया । वह बाह्यदृष्टिरूपसन्ताप से
रहित अन्त:शीलता को प्राप्त होकर ऐसे विश्रान्ति को प्राप्त हुई जैसे कि चन्द्रिका (चाँदनी)
से युक्त कुमुदिनी और वर्षाकालकी मयूरी अन्त:शीतलताको प्राप्त होकर विश्रान्ति को प्राप्त
होती है। उसको राजा की उस वाणी से अत्यन्त आनन्द हुआ | जैसे आकाश में मेघों के शब्द
से गर्भधारण करने पर बगले की पंक्ति को आनन्द होता है
सर्ग सन्दर्भ
इक्यासीवाँ सर्ग समाप्त बयासीवाँ सर्ग प्रसन्न हुई कर्कटी का राजा और मन्त्री को मन्त्र देना ओर उनका समाधि से व्युत्थित हुई इसके लिए वध्य लोगों का भोजनरूप से अर्पण करना |