Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 12–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
अनेन संविदणुना मेरुस्त्रिभुवनं तृणम् ।
वमित्वा बहिरन्तस्थं मायात्मकमवेक्ष्यते ॥ १२ ॥
चिदणोरन्तरे यद्यदस्ति तद्दृश्यते बहिः ।
संकल्पेष्टालिङ्गनादिदृष्टान्तोऽत्र हि रागिणः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
किस अणु से मेरूपर्वत अपने अन्दर किया जाता है और त्रिभुवन तृण बनाया जाता है, इन
प्रश्नों का उत्तर देते हैं।
वह संविद्रूपी अणु अपने अन्दर मेरू को रखता है और त्रिभुवनको तृण के समान तुच्छ
बनाता है।
शंका : यदि मेरू को वह अपने अन्दर रखता है, तो मेरु बाहर कैसे दिखाई देता है 2
समाधान : भीतर स्थित ही मेरू को बाहर मानों वमन करके मायात्मकरूप से बाहर
दिखलाता है यानी अन्दर स्थित मेरू की ही बाहर स्थित की नाई कल्पना करके उसको बाह्य
दिखाता है चिदणु के अन्दर जो जो वस्तु है, वह बाहर दिखाई देती है, इस विषयमें कामी
पुरुषों का संकल्प से कल्पित अपनी प्रेयसी का आलिंगन आदि दृष्टान्त है भाव यह कि
संकल्प से सिद्ध रत्री ओर उसका आलिंगन यद्यपि अन्दर है फिर भी बाह्यसंस्कार जनित होने
के कारण “बाहर-सा देखता हूँ” यह कामियोँ को अनुभव होता है