Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अणुरेव न मात्येष योजनानां शतेष्वपि ।
सर्वगत्वादनादित्वादरूपत्वादनाकृतिः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
कौन अणु होता हुआ भी सैकड़ों योजनो में नहीं समाता, इस प्रश्न का उत्तर देते हैँ ।
सर्वव्यापक होने से, अनादि होने से ओर रूपरहित होने से निराकार यह अणु ही सैकड़ों
योजनं में भी नहीं समाता है यानी उक्त अणु सर्वव्यापक है, अनादि है, रूपरहित है, फिर भी
सैकड़ों योजनो में नहीं समाता हे