Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
शुद्धसन्मात्रचित्त्वं यत्स्वतः स्वात्मनि संस्थितम् ।
तदेतदणुना तेजो दृष्टं बहिरवस्थितम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
चिदणु ने अपने मे ही तेज, तम आदि की कल्पना कर रक्खी है, इसलिए प्रकाश उसके
अधीन है, ऐसा कहते हैं।
शुद्ध सन्मात्र चित्स्वरूप, जो स्वतः आत्मा में स्थित था, उसी को अणुने बाहर स्थित
तेजरूप से देखा