Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
तेजांस्यर्केन्दुवह्नीनां न भिन्नानि तमोघनात् ।
एतावानेव भेदोऽस्ति यद्वर्णे शौक्ल्यकृष्णते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि सूर्य, चन्द्र आदि से भी प्रकाश की सिद्धि हो सकती है, फिर चिदणु
ने क्या विशेष किया ? इस पर कहते हैं।
सूर्य, चन्द्र और अग्नि का तेज अपने कारण अज्ञान से भिन्न नहीं है, अपने कारण अज्ञानसे
उनमें इतना ही भेद है कि उनकी वर्ण में शुक्लता और उष्णता है और जाड्योंमें तो कोई भेद
नहीं है, अत: उनसे प्रकाशकी क्या आशा ?