Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 32–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

तमस्त्वं तमसो देहमविनाशयतामुना । तप्यतेऽभासया भासा सर्वमाभास्यते तमः ॥ ३२ ॥ पद्मोत्पले यथार्केण तपता प्रकटीकृते । प्रकाशतमसोः सत्ते चितैवं प्रकटीकृते ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

चैतन्य का तो कहींपर भी अप्रकाश नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं। चिद्रूपी एक सूर्य रात-दिन आलस्यशून्य होकर बाहर-भीतर शिलाओं के अन्दरतक भी अस्त और उदय से रहित होकर तपता है ॥ ३ ०॥ उसीसे जीव की यह प्रसिद्ध त्रिलोकी भासित होती है । प्रकाशित होती है, जो अनेक प्रकार के भोगों ओर भोगसाधन सामग्रियों से पूर्ण है ओर कुटी के समान संकुचित कोठरियों से युक्त है ॥ ३ १॥ यदि आत्मा से तम का प्रकाश होता है, तो उसका तमसत्व ही नष्ट हो जायेगा, क्योकि जिन वस्तुओं का अप्रथनरूप (अप्रकटन) स्वभाव है, उसका नाश हुए बिना उनका प्रथन (प्राकट्य) नहीं किया जा सकता, इस शंका पर कहते हैं। वह परमात्मा स्वतत्त्व के प्रतिभास से शून्य चैतन्य द्वारा तम के स्वरूपभूत तमस्त्वका विनाश किये बिना तमको कार्य के लिए क्षुब्ध करता है, उससे सम्पूर्ण जगत्‌-भूत तमका आभास होता है