Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
अर्कः कुर्वन्नहोरात्रे दर्शयत्याकृतिं यथा ।
चितिः सदसती कृत्वा दर्शयत्याकृतिं तथा ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तप रहे सूर्य से पद्म ओर नील कमलो का विकास होता है, वैसे ही
चित्ने प्रकाश और तमकी सत्ता को प्रकट किया है । भाव यह कि तमकी सत्ता का प्रकट
करनेवाला होने के कारण भी वह तमकी निवृत्ति नहीं करता है ॥३ ३॥ जैसे सूर्य रात्रि ओर दिन
को बनाता हुआ अपनी आकृतिको दर्शाता हे, वैसे ही चिति ही आविर्भाव ओर तिरोभावरूप
प्रकाश और तमकी सृष्टि करके अपनी आकृति को दर्शाती है