Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 35–37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verses 35–37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
चिदणोरन्तरे सन्ति समग्रानुभवाणवः ।
यथा मधुरसस्यान्तः पुष्पपत्रफलश्रियः ॥ ३५ ॥
उद्यन्ति चिदणोरेते समग्रानुभवाणवः ।
मधुमासरसाच्चित्रा इव खण्डपरम्पराः ॥ ३६ ॥
परमात्माणुरत्यन्तनिःस्वादुः सूक्ष्मतावशात् ।
समग्रस्वादुसत्तैकजनकः स्वदते स्वयम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
किस अणु के उदर मे सम्पूर्ण अनुभवरूपी अणु है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं।
जैसे शहद के रस के अन्दर पत्र, पुष्प ओर फलों की शोभा विद्यमान रहती है, वैसे ही
चिदणु के अन्दर सम्पूर्ण अनुभवरूपी (वृत्ति से अवच्छिन्नज्ञानरूपी) अणु विद्यमान हैँ । जैसे
वसन्त ऋतु से वन- भागों का सौन्दर्य प्रकट होता है, वैसे ही इस चिदणु से ये सम्पूर्ण अनुभवरूपी
अणु उदित होते हैं