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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 47–48

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verses 47–48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 47,48

संस्कृत श्लोक

निमेषांशावबोधो हि चिदणोः प्रतिभासते । यतः कल्पसहस्रौघः स्वप्ने वार्धकबाल्यवत् ॥ ४७ ॥ ततः सोऽपि निमेषोणुः कल्पकोटिशतान्यलम् । सर्वसत्ताविलासेन प्रतिभैका विजृम्भते ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

कौन निमेष होता हुआ भी महाकल्प ओर करोड़ों कल्परूप है, इस प्रश्न का उत्तर कहते हैं । स्वप्न में जैसे बुढ़ापा और बाल्यावस्था का बोध होता है, वैसे ही चिदणु से निमेषांश का ज्ञान और सैकड़ों कल्पो के समूह का आभास प्रतीत होता है । इसलिए वह अणु निमेष होता हुआ भी सैकड़ों करोड़ों कल्पो का समूह है । सम्पूर्ण अभाससत्ताओं के विलास से यह एक प्रतिभा का विकास है