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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verses 49–50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verses 49–50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 49,50

संस्कृत श्लोक

अभुक्तवत्येव यथा भुक्तवानहमित्यलम् । जायते प्रत्ययस्तद्वन्निमेषे कल्पनिश्चयः ॥ ४९ ॥ अभुक्त्वा भुक्तवानस्मीत्येवं प्रत्ययशालिनः । दृश्यन्ते वासनाविष्टाः स्वप्ने स्वमरणं यथा ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न में भोजन न करनेपर भी “मैंने अच्छा भोजन कर लिया" इस प्रकारकी प्रतीति होती हैं, वैसे ही निमेष में कल्पो का निश्चय होता है भोजन किये बिना “मैने भोजन कर लिया इस प्रकार के ज्ञान से युक्त पुरूष स्वप्न में अपने मरण के तुल्य विविध वासनाओं से पूर्ण देखे जाते हैं