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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 59

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 59

संस्कृत श्लोक

चिदणुर्दृश्यसिद्ध्यर्थमान्तरीं चिच्चमत्कृतिम् । बहीरूपतया धत्ते स्वात्मनि परिसंस्थिताम् ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

कौन नेत्ररहित द्रष्टा दृश्य की सिद्धि के लिए अपने स्वरूप को दृश्यता को प्राप्त कर अपने को दृश्यरूप से देखता है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। चिद्रूपी अणु दृश्य की सिद्धि के लिए अन्दरस्थित चित्‌ के चमत्कार को यानी चिद्‌ में व्याप्त मायाशक्ति को, जो कि उसकी आत्मा में स्थित है, बाह्मप्रपंचरूप से अपने में धारण करता है