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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 63

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 63

संस्कृत श्लोक

दृगेव लोचने सा च वासनान्तं निजं वपुः । बहीरूपतया दृश्यं कृत्वा द्रष्टृतयोदिता ॥ ६३ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार द्रष्टता भी मिथ्याभूत दृश्यसापेक्ष होने के कारण मिथ्या ही है, ऐसा कहते हैँ । नेत्र द्वार होने के कारण लोचन (देखनेवाले) नहीं है, किन्तु अपरोक्ष आत्मचेतन्य ही लोचन हैं, क्योकि “वह चक्षु का चक्षु है", इत्यर्थक श्रुति है, वह आत्मचेतन्य आविर्भाव से लेकर पुनः तिरोभाव से वासनाभावान्त अपने शरीरभूत दृश्य को बाह्यरूप बनाकर उसके दुश्यरूप से स्वयं उदित हे यानी द्रष्टरूप से उसने अपनी कल्पना कर रक्खी है