Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 70
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
द्रष्टा दृश्यतया तिष्ठन्द्रष्ट्टतामुपजीवति ।
सत्यां कटकसंवित्तौ हेम काञ्चनतामिव ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो द्रष्टा का स्फुरण न होने पर दृश्य द्रष्टनिरपेक्षतावाला ही क्यो न होगा ? ऐसी यदि
कोई आशंका करे, तो ऐसा माननेपर दृश्य में जो द्रष्टाकी उपजीवकता है, उसका अभाव हो
जायेगा, इसलिए ऐसा मानना उचित नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
जैसे कटकरूप में प्राप्त होने पर सुवर्ण अपनी पूर्वसिद्ध कनकता का उपजीवन करता है
वैसे ही दृश्यरूप से स्थित होता हुआ द्रष्टा अपनी द्रष्टता का उपजीवन करता है