Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 81, Verse 69
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 81, verse 69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 69
संस्कृत श्लोक
कटकत्वावभासे हि यथा हेम्नो न हेमता ।
सत्येव प्रकचत्येवं द्रष्ट्टदृश्यस्थितौ वपुः ॥ ६९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि द्रष्टा ही दृश्यता को प्राप्त होता है, तो यह ब्रष्टा ही है, यों दृश्य की प्रतीति क्यो नहीं
होती ? इस पर कहते हैं।
जैसे कटकत्व की प्रतीति होने पर सुवर्ण की सुवर्णता सत्य होने पर भी स्फुटरूपसे स्फुरित
नहीं होती, क्योंकि मूढ की बुद्धि में सुवर्णता का स्फुरण नहीं होता, वैसे ही द्रष्टा के दृश्यरूप
से स्थित होने पर द्रष्टा का स्वरूप स्फुरित नहीं होता