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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 11–12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 82, verses 11–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

यतः सर्वैव जनता तप्ता दृढविषूचिका । मण्डले ननु तेनाहं निर्गतो रात्रिचर्यया ॥ ११ ॥ शूलादि हृदये नृणां न शाम्यति यदौषधैः । ततोऽहं त्वद्विधप्रोक्तमन्त्रार्थेन विनिर्गतः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

करने के लिए निकला हूँ, जब मनुष्यों के हृदय में शूलादि रोग ओषध द्वारा शान्त नहीं हुआ तब मैं तुम्हारे सरीखे पुरुषों द्वारा कहे गये मन्त्र की अभिलाषा से घर से बाहर निकला हूँ