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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 39–40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 82, verses 39–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 39,40

संस्कृत श्लोक

राक्षस्युवाच । मुग्धस्त्रीरूपधारिण्यै दातुं शक्तोऽसि भोजनम् । संतर्पयसि मां केन राक्षसाकारधारिणीम् ॥ ३९ ॥ रक्षोन्नमेव संतुष्ट्यै न सामान्यजनाशनम् । पूर्वसिद्धस्वभावोऽयमादेहं न निवर्तते ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

राक्षसी ने कहा : राजन्‌, मुग्धा युवती का रूपधारण करनेवाली मेरे लिए भोजन देने में आप समर्थ हैं, पर राक्षसरूप धारण करनेवाली मुझ को आप किससे तृप्त करेंगे ? राक्षस अन्न ही मेरे लिए सन्तोषप्रद होता है और सामान्य लोगों का भोजन मेरे सन्तोष के लिए नहीं होता, क्योकि यह मेरा स्वभाव बहुत काल से परिपक्व हो गया है, अत: जब तक मेरी देह रहेगी, तब तक यह हट नहीं सकता