Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 43–44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 82, verses 43–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 43,44
संस्कृत श्लोक
कान्तारूपं परित्यज्य गृहीत्वा राक्षसं वपुः ।
आदाय वध्याञ्छतशः पुरुषांस्तान्सुसंचितान् ॥ ४३ ॥
नयस्व हिमवच्छृंङ्गं तत्र भुङ्क्ष्व यथासुखम् ।
महाशनानामेकान्ते भोजनं हि सुखायते ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर सैंकड़ों-हजारों पापियों, चोरों
ओर दण्डनीयों को अपने राज्य से लाकर मैं तुम्हारा अनुरूप भोजन दूँगा ॥४ २॥ रत्रीके सुन्दर
रूप का परित्याग कर राक्षसी का शरीर धारण कर तुम सैकड़ों दण्डनीय पुरुषोको, जो कि
इकडे किये रहेंगे, उठाकर हिमालय पर्वत के शिखर पर ले जाना और वहाँ पर सुखपूर्वक उन्हे
खाना । जो अधिक भोजन करते हैं, उनको एकान्त मेँ भोजन करना बड़ा रूचिकर होता
है