Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 82, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
तत्र तृप्ता भृशं भुक्त्वा सुखं सुप्त्वा दिनत्रयम् ।
आसीत्प्रबोधसुस्वस्था सा समाधिमतिः पुनः ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ सुखपूर्वक भोजन करके खूब तृप्त हुई तीन दिन तक
लगातार सोकर जागरण से स्वस्थ हुई उसने फिर समाधि ले ली