Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verse 60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 82, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
जीवन्मुक्ततयैवमेव विपिने साद्यापि रक्षोङ्गना तस्मिन्नेव गिरौ स्थिता विचलितध्यानैकतानाशया ।
तस्मिन्राजनि शान्तिमागतवति त्यक्तैषणेनात्मना तद्राष्ट्राधिपसौहृदैः स्वकवलानास्वादयन्ती चिरं ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
वह राक्षसी आज भी पूर्वोक्त रीति से ही जीवन्मुक्त होने के कारण उसी हिमालय
पर्वत के वनमें कभी यानी व्युत्थान होने पर लौकिक व्यवहार करनेवाली कभी समाधि में
एकमात्र ज्ञान में लीन चित्तवाली होकर बैठी हे । उस किरातं के राजा के काल आने पर सकल
एषणाशून्य मन से विदेहकेवल्यरूप परम शान्ति को प्राप्त होने पर उसके वंशजो की, जो उस
समय उस राष्ट के अधिपति थे, मित्रता से पूर्व की नाई अपने ग्रासभूत वध्यो को खाती हुई
चिरकाल से स्थित है