Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 82, Verses 7–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 82, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 7, 8
संस्कृत श्लोक
सौरभं कुसुमासङ्गादेव सत्सङ्गमाच्छुभम् ।
वर्तते ह्यर्कसंपर्काद्विकासोऽम्बुरुहामिव ॥ ७ ॥
महतामेव संपर्कात्पुनर्दुःखं न बाधते ।
को हि दीपशिखाहस्तस्तमसा परिभूयते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सूर्य की किरणों के संसर्ग
से कमलों का विकास होता है और कुसुमों के संसर्ग से सुगन्धि प्राप्त होती है, वैसे ही सत्संगति
से कल्याण प्राप्त होता है । महात्माओं की संगति से फिर दुःख नहीं होता, जिसके हाथ में
दीपशिखा हो क्या ऐसा पुरुष अन्धकार से तिरस्कृत हो सकता है ?