Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 84, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
अविबोधादयं वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यते ।
ज्ञाते संशान्तकलनं मौनमेवावशिष्यते ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह व्यवहार उपदेश्य वस्तु का ज्ञान न होने से ही है यानी अज्ञानावस्था में ही है,
प्रबोधावस्था में नहीं है, इसलिए अद्वैत की हानि नहीं है, ऐसा कहते हैं।
यह भेदवाद परतत्त्व के अज्ञान से ही है, परमार्थ वस्तु के ज्ञात होने पर द्वैत नहीं रहता ।
उसके ज्ञात होने पर तो सम्पूर्ण कल्पनाओं से शून्य अशब्द ही केवल अवशिष्ट रहता है