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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verses 8–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 84, verses 8–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

अज्वलन्नेव काष्ठेषु वह्निरर्थक्रियां यथा । करोति मर्कटादीनां शीतापहरणादिकम् ॥ ८ ॥ समं सौम्यत्वमजहदेव नित्योदयस्थिति । तथा ब्रह्म करोतीदं नाना कर्तेव सज्जगत् ॥ ९ ॥ अप्यनागत एवायमेवं सर्ग उपागतः । भोः शालभञ्जिकासंविद्दारुण्येव मुधोदिता ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

काष्ठ में मिथ्या ही शालभंजिकाबुद्धि उदित होती है, वेसे ही अनागत ही यह सृष्टि आगत-सी प्रतीत होती है