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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 85, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 85, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 85 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

इतश्चेतश्च गच्छन्ति शीर्यन्ते प्रोद्भवन्ति च । दिग्लतासु तडित्पुष्पा वातार्ता मेघपल्लवाः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

दिशारूपी लताओं में तडद्रूपी फूलों से युक्त मेघरूपी पल्लव वायु से टकरा कर इधर-उधर घूमते हैं, नष्ट होते हैं और फिर उत्पन्न होते हैं