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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, Verses 37–42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 86, verses 37–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

लिपिकर्मार्पिताकारा ध्यानासक्तधियश्च ते । अन्तस्थेनैव मनसा चिन्तयामासुरादृताः ॥ ३७ ॥ अथ उत्फुल्लकमलकोशवक्रोन्नतासनः । ब्रह्माहं जगतां स्रष्टा कर्ता भोक्ता महेश्वरः ॥ ३८ ॥ यज्ञक्रियाक्रमवतः साङ्गोपाङ्गा महर्षयः । सरस्वत्याथ गायत्र्या युक्ता वेदा नरा इमे ॥ ३९ ॥ लोकपालपराक्रान्तः संचरत्सिद्धमण्डलः । अयमुद्दामसौभाग्यः स्वर्गः स्वरविभूषितः ॥ ४० ॥ पर्वतद्वीपजलधिकाननैः समलंकृतम् । इदं भूमण्डलं चैव त्रिलोकीकर्णकुण्डलम् ॥ ४१ ॥ एतत्पातालकुहरं दैत्यदानवभोजितम् । अमृतस्त्रीगणाकीर्णं गृहं गगनकोटरम् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

रूचि होने के कारण उसका उपाय पूछते हैं । और उन्होंने कहा : हे तात, जरा, मरण आदि सम्पूर्ण दुःखोंका जहाँ पर विनाश है, ऐसे पद्मासनरूप जगत्‌-पूज्य ब्रह्मत्व को (हिरण्यगर्भत्व को) हम शीघ्र कैसे प्राप्त होंगे ? ॥३ ३॥ जिज्ञायु अपने भाईयों को हिरण्यगर्भ अहंग्रह उपासना का सपरिकर उपदेश देने की इच्छा कर रहे उनके ज्येष्ठभ्राता ने पहले उसकी अंग्रभूत मरणपर्यन्त धारणा की ढता का उपदेश दिया, ऐसा कहते हैं। उस ज्येष्ठ भाई ने उन विपुल तेजस्वी भाइयों से फिर कहा : तुम सभी लोग, जो मैं कहूँ, उसका अनुसरण करो मैं पद्मासन में स्थित देदीप्यमान ब्रह्मा हूँ, अपने तेज से मैं सृष्टिकर्ता और संहारकर्ता हूँ, इस प्रकार तुम लोग चिरकालतक ध्यान करो। “ज्येष्ठ भाई के ऐसा कहनेपर जो आप कहते हैं, वैसा ही हम लोग करेंगे ।” - ऐसा कहकर वे सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मणपुत्र अपने बड़े भाई के साथ ही हिरण्यगर्भोपासना से होनेवाले फलमें अत्यन्त राग होने के कारण ध्यानासीन होकर बैठ गये ॥ ३४-३ ६॥ चित्रपट में लिखे हुए-से ध्यानासक्त उन्होंने अपने अन्दर स्थित मन से ही बड़े आदर के साथ यह विचार किया