Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 86, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 86, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
अयमिन्द्रो महाबाहुः प्रजालंकृतदोत्तमः ।
त्रैलोक्यनगरीमेकः पाति पावनयज्ञभुक् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
खूब खिले हुए कमल के कोश का मुख
ही मेरा उन्नत आसन हे, मैं ब्रह्मा ह, मे जगतां का रचयिता, कर्ता, भोक्ता, महेश्वर यानी नियन्ता
हूँ, यज्ञमूर्तिरूप मेरे अन्दर यज्ञ करनेवाले महर्षि और शिक्षादि अंग एवं पुराण आदि उपांगों से
युक्त सरस्वती तथा गायत्री के सहित वेद मूर्तिमान् होकर स्थित हैँ । लोकपालो से परिवृत्त, सिद्ध
मण्डलो के संचार से सुशोभित, उत्कृष्ट सौभाग्यशाली ओर देवांगनाओं के गान आदि की ध्वनि
से विभूषित स्वर्ग मेरे अन्दर है। पर्वत, द्वीप, समुद्र ओर वचनो से अलंकृत त्रिलोकीरूपी नायिका
के कानों का कुण्डलरूपी भूमण्डल मेरे भीतर है ॥ ३ ८-४१॥ दैत्य, दानवाँ से जिसका उदर
परिपूर्ण है, ऐसा पाताललोक देवताओं की अप्सराओं से व्याप्त घर के समान गगनकोटर (घर)
मेरे अन्दर स्थित है ॥ ४ २॥ यह महाबाहु इन्द्र, जो प्रजाओंको अलंकार प्रदान करनेवाले राजाओं
में सर्वोत्तम है, त्रैलोक्यरूपी नगरी का अकेले पालन करता है और पवित्र यज्ञों का भोक्ता है,
मेरे अन्दर है