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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 87, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 87, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

भानुरुवाच । पितामहक्रमे तस्मिंस्ततस्ते बहुभावनात् । कर्मभिस्तैः समाक्रान्तमनस्कास्तस्थुरादृताः ॥ १ ॥ यावत्ते देहकास्तेषां तापेन पवनैस्तथा । कालेन शोषमभ्येत्य गलिताः शीर्णपर्णवत् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीसूर्य ने कहा : हे पितामह, तदनन्तर वे एेन्दव ब्राह्मण उस उपासनाक्रममें बहुत भावना करने से भुवन, प्राणी, ग्राम आदिकी सृष्टि, पालन, संहार आदि तत्‌-तत्‌ कर्मो से आपके समान व्यग्र चित्तवाले उसीमें अत्यन्त आसक्त होकर तब तक स्थित रहे, जब तक कि उनके कृश शरीर सूर्य के सन्ताप ओर वायु से चिरकाल तक सूखकर पुराने पत्ते के समान विनष्ट हो गये

सर्ग सन्दर्भ

छियासीवाँ सर्ग समाप्त सत्तायीवों सर्ग मन से ब्रह्मा बने हुए उन लोगों की देह के राक्षसा द्रारा भक्षण करनेपर उनकी संहार ओर सर्ग में वैसी ही स्थिति रही, यह वर्णन ।