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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 87, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 87, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 87 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

विविधकल्पनया वलिताम्बरं यदिदमुत्तम जागतमुत्थितम् । करणजालकमाहितमोहनं तदखिलं निजचेतसि विभ्रमः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे विरोध क्यों नहीं है ? इस पर केवल मन की कल्पना होने से उनका सर्ग असत्य ही है, इस आशय से कहते हैं। हे उत्तम, अनेक प्रकार की कल्पनाओं द्वारा आकाश को वेष्टित करनेवाला, बाह्य ओर आभ्यन्तर करणो का जाल के सदुश बन्धनरूप, आसक्त से मोहित करनेवाला जो यह जगत दृश्य उत्पन्न हुआ है, वह सब उनके चित्त में भ्रान्तिमात्र ही है, वस्तुतः कुछ नहीं हे