Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 89, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
भानुरुवाच ।
मनो हि जगतां कर्तृ मनो हि पुरुषः परः ।
मनःकृतं कृतं लोके न शरीरकृतं कृतम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
भानु ने कहा : भगवन्, मन ही जगतो का रचयिता है, समष्टिभावापन्न मन ही परम पुरुष
यानी हिरण्यगर्भ है । लोकमें जो कार्य मनसे किया गया हो, वही कृत है और शरीर द्वारा किया
गया कुछ भी कृत नहीं है
सर्ग सन्दर्भ
अद्जसीवाँ सर्ग समाप्त नवासीवाँ सर्ग बद्धमूल मन की अन्य प्रयत्नं से अविचलता का इन्दु ओर अहल्या की मनोवृत्ति से कथन द्वारा वर्णन |