Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 89, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
आद्यं शरीरमिह विद्धि मनो महात्म-
न्संकल्पितो जगति तेन शरीरसङ्घः ।
आद्यं शरीरमधितिष्ठति यत्र यत्र
तत्तद्भृशं फलति नेतरदस्य पुंसः ।। ५१
हिन्दी अर्थ
हे महात्मन्, मन आत्मा का पहला भोगायतन
है, यह समझिए ओर उसने जगत् में सम्पूर्ण शरीरों की कल्पना कर रक्खी है । इस पुरुष का
वह आद्य भोगायतन मन जहाँ-जहाँ पर “अहम्” इस अभिमान से आविर्भूत होता है, उससे
तत्-तत् शरीर का आकार उत्पन्न होता है, अन्य नहीं होता