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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verse 52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 89, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

मुख्याङ्कुरं सुभग विद्धि मनो हि पुंसो देहास्ततः प्रविसृतास्तरुपल्लवाभाः । नष्टेऽङ्कुरे पुनरुदेति न पल्लवश्री- र्नैवाङ्कुरः क्षयमुपैति दलक्षयेषु ।। ५२

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ का ही दृष्टान्त द्वारा उपपादन करते हुए कहते हैं । हे सुभग, मन को ही मुख्य अंकुर जानिये । उससे वृक्षके पल्लव आदि के तुल्य पुरूष की देह उत्पन्न हुई है, फैली है। अंकुर के नष्ट होने पर फिर पल्लव शोभा उदित नहीं होती, किन्तु पल्लवो के क्षीण होने पर अंकुर का कदापि नाश नहीं होता