Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 89, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
देहे क्षते विविधदेहगणं करोति
स्वप्नावनाविव नवं नवमाशु चेतः ।
चित्ते क्षते तु न करोति हि किंचिदेव
देहस्ततः समनुपालय चित्तरत्नम् ।। ५३
हिन्दी अर्थ
इसीलिए देह का नाश होने पर भी पुनः पुनः देह की उत्पत्ति होती है, किन्तु चित्त का नाश
होने पर कैवल्य ही होता है, फिर उत्पत्ति नहीं होती, ऐसा कहते हैं ।
देह के नष्ट होने पर भी मन अनेक देहों को उत्पन्न करता है, जैसे कि स्वप्नभूमि में चित्त
नये-नये स्वप्नों को दर्शाता है और चित्त के नष्ट होने पर तो शरीर किसीका भी उत्पादन नहीं
करता, इसलिए सम्पूर्ण पदार्थो के हेतुभूत चिन्तामणि के सदश मनकी परमपुरुषार्थसाधनरूप
से रक्षा कीजिए। अपने तुच्छ क्रोध आदि के कारण उसका विनाश न कीजिए, यह अर्थ है