Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 89, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
दिशि दिशि हरिणाक्षीमेव पश्यामि राजन्
प्रिययुवतिमनस्त्वान्नित्यमानन्दितोऽस्मि ।
तव पुरप्रकृतीनां यत्फलं दुःखदायि
क्षणमथसुचिरं तत्तन्न पश्यामि किंचित्।। ५४
हिन्दी अर्थ
जो बात पहले कही थी, उसीका समुचितरूप से अनुवाद कर उपसंहार करते हुए दण्ड में
प्रयत्न की विफलता को दशति हैं।
हे राजन्, प्रिय युवती मेरे मन में स्थित है, अतएव प्रत्येक दिशामें उसको मैं देखता हूँ और
नित्य आनन्द में हूं । तुम्हारे नगर के अन्तर्गत तुम्हारे सेवक आदि में जो मुझे दुःख देनेवाले
कशाघात, शस्त्राघात आदि हैं, उनके फलभूत दुःखको एक क्षणभर अथवा बहुत देरी तक मैं
कुछ भी नहीं देखता