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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verses 28–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 9, verses 28–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 28-30

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । विद्यते चेत्त्रिभुवनं तत्तत्तां संप्रयान्तु ते । यत्र त्रैलोक्यशब्दार्थो न संभवति कश्चन ॥ २८ ॥ एतत्त्रिलोकतां यातं ब्रह्मेत्युक्तार्थधीः कुतः । तस्मान्नो संभवत्येषा जगच्छब्दार्थकल्पना ॥ २९ ॥ अनन्यच्छान्तमाभासमात्रमाकाशनिर्मलम् । ब्रह्मैव जगदित्येतत्सर्वं सत्त्वावबोधतः ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

दृश्यमान जगत्‌की पूर्वोक्त अत्यन्त अनुत्पत्तिका ही अवलम्बन कर श्रीवस्तिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजीकी शंका का निराकरण करते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, यदि त्रैलोक्य हो, तो वे (विदेहमुक्त) त्रेलोक्यताको प्राप्त हों । जहाँ पर त्रैलोक्यशब्द का कोई अर्थ हीं नहीं हो सकता, वहाँ पर यह ब्रह्म (विदेहमुक्त) त्रैलोक्यरूपता को प्राप्त हुआ, इस प्रकार आपके द्वारा शंकित अर्थकी प्रतीति ही केसे हो सकती है ? इससे सिद्ध हुआ कि वन्ध्यापुत्र शब्द के अर्थ की कल्पना की नाई जगत्‌शब्द के अर्थ की कल्पना नहीं हो सकती । यह सम्पूर्णं जगत्‌ सजातीय ओर विजातीय भेद से शून्य, निर्विकार, आकाश के समान निर्मल चिन्मात्र ब्रह्म ही है, क्योकि सम्पूर्ण जगत्‌ के पदार्थो में सन्मात्रता की प्रतीति होती हे