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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verses 31–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 9, verses 31–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 31-34

संस्कृत श्लोक

अहं हि हेमकटके विचार्यापि न दृष्टवान् । कटकत्वं क्वचिन्नाम ऋते निर्मलहाटकात् ॥ ३१ ॥ जलादृते पयोवीचौ नाहं पश्यामि किंचन । वीचित्वं तादृशं दृष्टं यत्र नास्त्येव तत्र हि ॥ ३२ ॥ स्पन्दत्वं पवनादन्यन्न कदाचन कुत्रचित् । स्पन्द एव सदा वायुर्जगत्तस्मान्न भिद्यते ॥ ३३ ॥ यथा शून्यत्वमाकाशे ताप एव मरौ जलम् । तेज एव सदा लोके ब्रह्मैव त्रिजगत्तथा ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि ज्ञानद्रष्टि से पर्यालोचन किया जाय, तो ब्रह्मे अध्यस्त जगत्‌ की असत्ता स्पष्टतया प्रतीत हो जाती है, इस बात का दृष्टान्तो द्वारा अनुभव कराते है। वत्स, मैंने सोने के कड़े में, बहुत विचार करके भी, विशुद्ध सुवर्णं के सिवा “कटकः नामक कोई वस्तु कहीं नहीं देखी । जल-तरंगमें जल के सिवा में कुछ नहीं देखता हूँ और जहाँ पर तरंग नहीं दिखाई देती, वहाँ पर भी जलके सिवा कुछ नहीं है । भाव यह है कि जलकी चाहे तरंगावस्था हो, चाहे अतरंगावस्था हो, दोनों जलके सिवा अन्य कुछ वस्तु नहीं है । वायु से भिन्न स्पन्दत्व नाम की कोई वस्तु कभी कहीं पर नहीं देखी गई, स्पन्द (वायु की गति) सदा वायुरूप ही है, इसलिए ब्रह्म से जगत्‌ अतिरिक्त नहीं है, किन्तु ब्रह्मरूप ही है । जैसे आकाश में शून्यत्व, मरूभूमि में ताप ही जल और प्रकाश तेजरूप है, वैसे ही त्रैलोक्य ब्रह्म ही हे