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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verses 35–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 9, verses 35–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 35-38

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अत्यन्ताभावसंपत्त्या जगद्दृश्यस्य मुक्तता । ययोदेति मुने युक्त्या तां ममोपदिशोत्तमाम् ॥ ३५ ॥ मिथःसंपन्नयोर्द्रष्ट्रदृश्ययोरेकसंख्ययोः । द्वयाभावे स्थितिं याते निर्वाणमवशिष्यते ॥ ३६ ॥ दृश्यस्य जगतस्तस्मादत्यन्तासंभवो यथा । ब्रह्मैवेत्थं स्वभावस्थं बुध्यते वद मे तथा ॥ ३७ ॥ कयैतज्ज्ञायते युक्त्या कथमेतत्प्रसिद्ध्यति । एतस्मिंस्तु मुने सिद्धे न साध्यमवशिष्यते ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

श्री गुरुजी ने जो दृष्टान्त दशयि, उन पर भलीभाँति विचार कर श्रीरामचन्द्रजीको गुरुजी द्वारा कथित अथमि जो संभावना हुई उसे दो श्लोको से बतलाते हुए तथा उसमे विपरीतभावनारूप विक्षेप के होने के कारण फिर असंभावना आदि विकल्पों के उदय से अस्थिर मन द्वारा उस उपदेश से उक्त तत्त्व का धारण करने में असमर्थ-से होते हुए-श्रीरामचन्द्रजी उसके अवधारण के उपाय पूछते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, जिस युक्ति से दृश्यमान जगत्‌ के बाध द्वारा मुक्ति प्राप्त हो उस उत्तम युक्तिका मुझे उपदेश दीजिये । परस्पर एक संख्यामें प्राप्त हुए यानी वाध के अवधिरूप से अवशिष्ट स्वप्रकाश आत्मभावको प्राप्त हुए द्रष्टा और दृश्य में द्वितीयता के अभाव के स्थिर होने पर निर्वाण (मुक्ति) शेष रहती हैँ । इसलिए जिससे दृश्य जगत्‌ का अत्यन्त अभाव (बाध) हो ओर जगत्‌का बाध होने पर कूटस्थ ब्रह्म का ही बोध हो, उस उपाय को मुझसे कहिए । उक्त बात किस युक्ति से ज्ञात होती है ओर कैसे स्थिर होती है, हे मुनिश्रेष्ठ, इसके स्थिर होने पर फिर कुछ भी साध्य (कर्तव्य) शेष नहीं रहता