Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 9, Verses 39–44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 9, verses 39–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 9 · श्लोक 39-44
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
बहुकालमियं रूढा मिथ्याज्ञानविषूचिका ।
नूनं विचारमन्त्रेण निर्मूलमुपशाम्यति ॥ ३९ ॥
न शक्यते झटित्येषा समुत्सादयितुं क्षणात् ।
समप्रपतने ह्यद्रौ समरोहावरोहणे ॥ ४० ॥
तस्मादभ्यासयोगेन युक्त्या न्यायोपपत्तिभिः ।
जगद्भ्रान्तिर्यथा शाम्येत्तवेदं कथ्यते श्रृणु ॥ ४१ ॥
वक्ष्याम्याख्यायिकां राम यामिमां बोधसिद्धये ।
तां चेच्छृणोषि तत्साधो मुक्त एवासि बोधवान् ॥ ४२ ॥
अथोत्पत्तिप्रकरणं मयेदं तव कथ्यते ।
यत्किलोत्पद्यते राम तेन मुक्तेन भूयते ॥ ४३ ॥
इयमित्थं जगद्भ्रान्तिर्भात्यजातैव खात्मिका ।
इत्युत्पत्तिप्रकरणे कथ्यतेऽस्मिन्मयाधुना ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रुत अर्थ की एक बार संभावना होने पर पुनः पुनः चिरकाल तक उसका अभ्यास ही
उसके अवधारण का उपाय है, ऐसा श्रीवस्रिष्ठजी बोले।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, चिरकाल से बद्धमूल यह अज्ञानरूपी विषूचिका
(हैजा) विचाररूपी मन्त्र से समूल नष्ट हो जाती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं हे । कोई चाहे
कि मैं तुरन्त एक क्षण में इसे नष्ट कर दूँ, तो उसका वैसा चाहना ठीक नहीं, क्योकि एक क्षण
में शीघ्र इसका नाश होना कठिन ही नहीं असंभव है, जैसे कि पर्वत शिखर पर चढ़े हुए पुरूष
के लिए जिसके चारों ओरसे नीचे गिरना तुल्य ही है, ऐसे पर्वतमें एक ही समय मेँ चढना और
उतरना कठिन ही नहीं असम्भव हे । वैसा ही यहाँ पर भी समझना चाहिए । अतएव आपकी यह
जगद्भ्रान्ति पुनः पुनः अभ्याससे, युक्तियों से तथा दृष्टान्तो द्वारा जैसे शान्त हो जाय वैसे में
कहता हूँ, आप सुनिए । हे श्रीरामचन्द्रजी, आपको बोध की प्राप्ति होने के लिए जिस
आख्यायिका को कहूँगा, हे सज्जनशिरोमणे, उसको यदि आप सुनेंगे, तो ज्ञानी होकर अवश्य
मुक्त ही हो जायेंगे, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं हे । प्रलयाख्यायिका के अनन्तर मैं आपसे
जगत् की उत्पत्तिका क्रम कहूँगा । हे रामजी, जो जो उत्पन्न होता है, वही मुक्त होता है
अर्थात् बन्धशून्य स्वरूप से स्थित होता है । उत्पत्ति-प्रकरण यानी जगदुत्पत्तिक्रम । वह
निर्विकार ब्रह्म ही जिसका उपादान है, ऐसा जगत् विवर्त ही है, ऐसा फलित होता है, इस
प्रकार बन्धके मिथ्या होने पर मोक्ष स्वत-सिद्ध ठहरा, यही उत्पत्तिप्रकरण के वर्णन का अभिप्राय
है । इस प्रकार यह जगद्भ्रान्ति कभी उत्पन्न न हुई तथा शन्यरूप होती हुई भी प्रतीत होती है,
इस उत्पत्तिप्रकरण में अब यही मेँ आपसे कहूँगा