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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verses 19–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 91, verses 19–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 19-21

संस्कृत श्लोक

यथा चैन्दवजीवास्ते चित्रत्वाद्ब्रह्मतां गताः । वयं तथैव चिद्भावाच्चित्तत्वाद्ब्रह्मतां गताः ॥ १९ ॥ चित्तं हि प्रतिभासात्म यच्च तत्प्रतिभासनम् । तदिदं भाति देहादि स्वान्तं नान्यास्ति देहदृक् ॥ २० ॥ चित्तमात्मचमत्कारं तच्च तत्कुरुते स्वतः । यथावत्संभवं स्वात्मन्येवान्तर्मरिचादिवत् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे एेन्दव जीव चिद्भाव से चित्तत्व को प्राप्त कर चित्तत्व से हिरण्यगर्भता को प्राप्त हुए, वैसे ही हम भी चिद्भाव से चित्तत्व को ओर चित्तत्व से ब्रह्मता को प्राप्त हो गये। चित्त प्रतिभासस्वरूप है, उसका जो प्रतिभासन है, वही देहादिरूप से प्रतीत होता है । इसलिए देहादि मन ही हैँ । देहप्रतीति चित्त से अन्य नहीं है । चित्त अपने में विविध कल्पनाओंसे युक्त है ओर वह उनकी रचना करता है । यदि कोई कहे कि यदि ऐसा है, तो सबका मन एकसी ही कल्पना क्‍यों नहीं करता, तो यह शंका युक्त नहीं है, क्योकि काम, कर्म और वासना के अनुसार जिस समय जिसके लिए जैसा संभव होता है, उस समय उसके लिए उतना ही उस प्रकार होता है, जैसे कि मिर्चा कटुता से ही अपने अन्दर परिणाम को प्राप्त होता है, निम्ब तिक्तरूप से परिणत होता है और द्राक्ष मधुरता से ही ये सब अपने अपने संस्कार से व्यवस्थित हैं, वैसे ही मन भी तत्‌-तत्‌ समय में तत्‌-तत्‌ वस्तु की अपने में ही रचना करता है