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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 91, Verses 34–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 91, verses 34–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 91 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

दार्वादीनामचित्त्वेन नोपलम्भस्य संभवः । उपलम्भो हि सदृशसंबन्धादेव जायते ॥ ३४ ॥ उपलब्धेऽजडं विद्धि तेनेदं सर्वमेव हि । उपलम्भो हि सदृशसंबन्धात्स्यात्समात्मनोः ॥ ३५ ॥ जडचेतनभावादिशब्दार्थश्रीर्न विद्यते । अनिर्देश्यपदे पत्रलतादीव महामरौ ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

यह जड है अथवा यह चेतन है यह व्यवस्था अनुपलब्धि के समय होती है या उपलब्धि के बाद ? पहले पक्ष में उपलब्धि का ही सम्भव न होने से उसकी सत्ता सिद्ध होती ही नहीं है, उसकी जडता और अजड़ता का विचार तो दूर रहा, इस आशय से कहते हैं। वृक्ष आदि पदार्थ चिन्मय नहीं हे, अतः उनकी उपलब्धि का सम्भव नहीं है, क्योंकि सदृश वस्तुओं की (प्रमातृचैतन्य और प्रमेयचेतन्य की) सदृश सम्बन्ध से वृत्तिद्वारक ऐक्य सम्बन्ध से उपलब्धि होना प्रसिद्ध है केवल जड़ैक्यरूपवाद में तो प्रमेयचैतन्य ही नहीं है, फिर उसके उपलम्भ (प्रत्यक्ष ज्ञान) का संभव कैसे ?